
ब्यूरो रिपोर्ट.. अनुराग तिवारी
बांदा -आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को पुत्र की आयु, आरोग्य लाभ, तथा सर्वाधिक कल्याण के लिए महालक्ष्मी पूजा का विधान है। इस वर्ष महालक्ष्मी पूजन 14 सितंबर, रविवार को घर-घर में पार्थिव हाथी के साथ महालक्ष्मी का पूजन किया जाएगा। रीना सिंह ने बताया कि इस दिन महिलाएं व्रत रखकर किसी जलाशय में जाकर सोलह बार दूर्वा से तर्पण करती हैं और हाथी सहित महालक्ष्मी का पूजन करती हैं। महिलाएं इस व्रत को अपने पुत्र-पौत्रों की लंबी आयु एवं सुंदर स्वास्थ्य की कामना से करती हैं। इस पूजन में सोलह का विशेष महत्व है। सोलह गांठ का एक गढ़ा तैयार करके लक्ष्मी जी को अर्पण करती हैं और सोलह बार कहानी कहती हैं।रीना सिंह ने बताया कि इस वर्ष महालक्ष्मी पूजन रवि सिद्धि योग वृष के चंद्रमा में किया जाएगा।यह है व्रत का विधान: प्रातः काल उठकर किसी जलाशय में जाकर ताजी दूर्वा से तर्पण करें। 16 गणुआ धारण करें। स्वच्छ वस्त्र पहनें। पवित्र होकर संकल्प के साथ प्रदोष काल में गाय के गोबर से लीप कर चौक पूर्ण कर पटा पर हाथी को रखें। पूजन करते समय अपना मुंह पूर्वोत्तर में हो। हाथी का पूजन करें। शालीवाहन राजा के पुत्र धर्मात्मा जीमूत वाहन को अनेक रत्नों, मणियों, एवं अलंकारों से अलंकृत करें तथा धूप, दीप, अक्षत, पुष्पमाला से पूजन करें। नैवेद्य का भोग लगाएं। साथ में महालक्ष्मी का पूजन गहने, अलंकारों से करें। 16 दीपक जलाएं एवं 16 बोल की 16 बार कहानी कहें।सोलह गांठ का गढ़ा, सोलह बार डुबकी, सोलह श्रृंगार, सोलह बार मुंह धोना, सोलह बार तर्पण, सोलह दीपक, सोलह बोल की कहानी, सोलह दिन का व्रत, सोलह सामग्री से पूजन, सोलह गणुआ आदि। पंडित शास्त्री ने बताया कि इस वर्ष महालक्ष्मी पूजन रविवार को किया जाएगा। अष्टमी तिथि दृश्य गणित के अनुसार एवं स्थानीय मानक समय के अनुसार अष्टमी तिथि सुबह प्रारंभ होगी और रात में 3:06 तक रहेगी। उदया तिथि एवं प्रदोष काल में अष्टमी तिथि रविवार को रहेगी। शास्त्रों के अनुसार महालक्ष्मी पूजन प्रदोष काल में करना बताया गया है। इस व्रत में प्रदोष व्यापिनी तिथि ही ग्रहण करनी चाहिए।


